Thursday, May 14, 2009

बस यूँ ही !

थिरक् उठे पांव आज अचानक ,बस यूँ ही ,
आए तुम याद जो आज फिर , बस यूँ ही,
कल ही की तो बात है, पतंग बन ऊड़ा करते थे हम दोनों ,
कट गई डोर फिर क्यों अचानक, बस यूँ ही,
कच्चे धागे जो बाकी थे , वो भी तार-तार हुए ,
तुम उस पार-हम इस पार ,फिर अजनबी हुए,
शायद किसी मोढ़ पर फिर मुलाकात हो कभी,
दिल को छु गया ये ख्याल आज फिर अचानक ,बस यूँ ही!



Written on 13th august'99.......

3 comments:

Pal said...

Dil ko chu gayi kavita Nidhi....lagta hai Zindghi ka har rang dekha hai tumne..isliyee apni kavita main yeh sab rang bhar pati hu....keep writing.

nidhi said...

:D........thanx pal

Nimisha said...

waah Nids...bahut badhiya.
loved the line "patang ban uda karte the"
I can almost visualize ur feelings.
keep it up gal.